Sheetla Ashtami 2021: जानिए शीतला माता को क्यों लगाया जाता है ठंडे पकवानों को भोग

शीतला अष्टमी हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है। इस दिन शीतला माता का व्रत और पूजन किया जाता है। होली के अगले सप्ताह में आने वाले इस त्योहार पर ठंडे पकवान माता के चढ़ाए जाते हैं। शीतला देवी की पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से प्रारंभ होती है लेकिन कुछ स्थानों पर ये पूजा होली के बाद पड़ने वाले सोमवार या गुरुवार को होती है। sheetla mata के एक दिन पूर्व उन्हें भोग लगाने के लिए बसौड़ा तैयार किया जाता है। अष्टमी के दिन बासी खाना देवी को समर्पित किया जाता है।

जानिए व्रत विधि……

शीतला अष्टमी का व्रत के लिए कई चीजों का ध्यान रखना जरूरी है। sheetla mata temple माता के प्रसाद के लिए और परिवार के भोजन के लिए एक दिन पहले ही खाना पकाया जाता है। शीतला माता को साफ सफाई पसंद है। इस दिन सुबह जल्द उठना चाहिए। इसके बाद स्नान करें और व्रत का संकल्प लेकर विधि विधान से मां शीतला की पूजा करते हुए ठंडे पकवान अर्पित करें। शीतला सप्तमी-अष्टमी व्रत की कथा सुनें।

यहां लगता है शीतला अष्टमी का मेला

राजस्थान में भी शीतला माता के कई जगह मेले लगते हैं। शीतलाअष्टमी को राजधानी जयपुर के दक्षिण दिशा में करीब 70 किलोमीटर दूर शीतला माता का मंदिर विराजमान है। चाकसू कस्बे में माता का मंदिर पहाड़ी पर दूर से ही अपने भव्य आकर्षण के साथ नजर आता है। यहां हिंदु-मुस्लिम लोग सालभर दर्शन करने आते हैं। लेकिन चैत्र माह में शीतला अष्टमी यानि बास्योडा के मौके पर यहां दो दिवसयी लक्खी मेला भरता है। इस स्थान को शील डूंगरी के नाम से भी जाना जाता है।

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बच्चों के लगवाई जाती है ढोक

बच्चों को माता निकलने यानि चेचक की बीमारी के बाद यहां माता के मंदिर में ढोक लगवाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।

पूजा जाता है मंदिर की पहाड़ी का पत्थर

शील की डू्ंगरी पर स्थित शीला माता का ये मंदिर 500 साल पुराना बताया जाता है। शील की डूंगरी पर बने इस मंदिर की पहाड़ी भी अनोखी है। इस पहाड़ी का पत्थर माता की मूर्ति के रूप में पूजा जाता है। इसलिए लोग यहां से पत्थर भी अपने घर पर लेकर आते हैं।

शीतला सप्तमी व्रत कथा…..

एक बार शीतला सप्तमी के दिन एक बुढ़िया और उसकी दो बहुओें ने व्रत रखा। उस दिन सभी को बासी भोजन ग्रहण करना था। इसलिए पहले दिन ही भोजन पका लिया गाय। लेकिन दोनों बहुओं को कुछ समय पहले ही संतान की प्राप्ति हुई थी। कहीं बासी भोजन से उनकी संतान बिमार ना हो जाए। इसके चलते उन्होंने बासी भोजन ग्रहण नहीं किया। अपनी सास के साथ माता की पूजा कर अपने लिए चूरमा बनाकर खा लिया। जब सास ने बासी भोजन खाने की कही तो काम का बहाना बनाकर टाल गई। उनके इस कृत्य से माता क्रोधित हो गई और उन दोनों के नवजात शिशु मृत पाए गए। जब सास को पूरी बात का पता चला तो उसने दोनों बहुओं के घर से निकाल दिाय।

दोनों अपने शिशुओं के शवों के साथ विश्राम के लिए एक बरगद के नीचे ठहर गई। वहीं पर परेशानी से तंग आई ओरी और शीतला नामक दो बहनों से उनकी मुलाकात हुई। दोनों बहुओं को उन पर दया आई और उनकी मदद की। बहुओं को आशीष दिया कि तुम्हारी गोद भर जाए। तब उन्होंने कहा कि हरी-भरी गोद ही लुट गई। इस पर शीतला ने कहा कि पाप कर्म का दंड तो भुगतना ही पड़ेगा। ये सुन बहुंओं ने साक्षात माता को पहचान लिया और चरणों में गिर कर क्षमा याचना की भीख मांगने लगी। माता को भी उनके पश्चाताप करने पर दया आई तो मृत बालक जीवित हो गए. इसके बाद वो हंसी खुशी गांव लौटी। इस चमत्कार को देखकर हर कोई हैरान रह गया। इसके बाद पूरा गांव माता को मनाने लगा।   

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