CrPC की धारा 41A को लेकर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक, पुलिस को निर्देश देने का अधिकार नहीं
FIR रद करने पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने FIR से जुड़े मामलों में हाईकोर्ट की भूमिका को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि अगर कोई हाईकोर्ट FIR रद करता है, तो वह पुलिस को CrPC की धारा 41A का पालन करने का आदेश नहीं दे सकता। यह टिप्पणी तेलंगाना हाईकोर्ट के एक आदेश पर सुनवाई के दौरान की गई, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
दो जजों की बेंच ने सुनाया फैसला
यह फैसला जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की दो सदस्यीय पीठ ने सुनाया। बेंच ने कहा कि FIR रद करने की स्थिति में अदालत द्वारा पुलिस को धारा 41A के तहत नोटिस जारी करने या उसका पालन सुनिश्चित करने का निर्देश देना कानूनी रूप से गलत है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, ऐसी राहत अंतरिम प्रकृति की होती है, जो FIR रद होने के बाद लागू नहीं रह सकती।
धारा 41A को लेकर क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 41A के तहत यदि आरोपी नोटिस के जवाब में जांच एजेंसी के सामने नियमित रूप से पेश होता है, तो उसकी गिरफ्तारी जरूरी नहीं होती। हालांकि, अदालत ने यह भी जोड़ा कि यह प्रावधान केवल चलती FIR और जांच के दौरान लागू होता है। FIR रद होने के बाद इस तरह का निर्देश देना न्यायिक सीमा से बाहर है।
हाईकोर्ट के आदेश पर क्यों लगी रोक
दरअसल, तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक मामले में FIR रद करते हुए पुलिस को यह निर्देश दिया था कि वह CrPC की धारा 41A का पालन करे। इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि FIR रद करने के बाद जांच की कोई आवश्यकता नहीं बचती, ऐसे में पुलिस को किसी विशेष प्रक्रिया का पालन करने का निर्देश देना तार्किक नहीं है।
अब क्या बदलेगा
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब देशभर के सभी हाईकोर्ट्स के लिए यह स्पष्ट हो गया है कि FIR रद करते समय अतिरिक्त निर्देश जारी नहीं किए जा सकते। इससे न्यायिक प्रक्रिया में एकरूपता आएगी और अधिकारों के दायरे भी स्पष्ट होंगे। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न्यायिक अनुशासन को मजबूत करेगा और प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकेगा।
क्या है CrPC की धारा 41A
CrPC की धारा 41A, जिसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35 कहा जाता है, पुलिस को यह अधिकार देती है कि वह संज्ञेय अपराधों में आरोपी को गिरफ्तार किए बिना ही जांच में शामिल होने का नोटिस दे सके। इसका मुख्य उद्देश्य अनावश्यक और मनमानी गिरफ्तारियों पर रोक लगाना है।
