Holi 2021 Celebrate: जानिए क्यों मनाया जाता है रंगों का त्योहार होली

आज हम आपको एक ऐसे पर्व से रूबरू कराने जा रहे हैं जो आपके जीवन में खुशियों की बहार लेकर आता है। हम उस त्योहार की बात कर रहे हैं जो घर के आंगन में रंगों की बिसात बिछा देता है। जी हां हर साल मनाए जाने वाले holi 2021 celebration होली पर्व को लेकर हर किसी के मन में उत्साह है। रंगों के त्योहार होली को बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व माना जाता है। लेकिन हर किसी को ये जानने की उत्सुकता है कि आखिर होली पर्व पूर्णिमा को ही क्यों मनाया जाता है?

कैसे मनाते हैं होली……

फाल्गुन के महीने में पड़ने वाली पूर्णिमा के दिन होली का त्योहार सेलिब्रेट किया जाता है। प्राचीन पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा हिरण्यकश्यप की एक पौराणिक कथा है। जिससे होली का पर्व जुड़ा हुआ है।  holi festival 2021 wishes खुशियों और भाईचारे का त्योहार होली पर आपसी गिले शिकवे भुलाकर एक दूसरे के रंग-गुलाल लगाकर खुशियां बांटते हैं। होली के पर्व से ठीक एक महीने पहले त्यौहार की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बाजार रंग-गुलाल से गुलजार हो जाते हैं। होली के अगले दिन रंग गुलाल के साथ होली खेली जाती है जिसे धुलंडी के नाम से जाना जात है। धुलंडी बच्चों से लेर बड़े तक हंसते-गाते चंग की थाप और डीजे की धमाल के बीच होली खेली जाती है।

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क्यों मनाई जाती है होली……

Holi 2021 के पर्व मनाने के पीछे एक पौराणिक कथा है। धार्मिक ग्रथों के अनुसार, राक्षसों के राजा कश्यप और उसकी पुत्री दिति के दो पुत्र हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप थे। हिरण्याक्ष बलशाली होने के साथ ब्रह्मा की तपस्या से वरदान प्राप्त था। इस वरदान को पाकर हिरण्याक्ष खुद को सबसे अधिक बलशाली समझता था। इस वजह से वो अत्यधिक क्रूर और अत्याचारी हो उठा था। एक बार हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र के नीचे पाताल लोक में छिपा दिया। इससे समस्त देवता चिंतित हो गए और पृथ्वी को पालात लोक से बाहर लाने के लिए सभी देवताओं ने मिलकर जल में निवास करने वाले भगवान विष्णु से हिरण्याक्ष को सबक सिखाने की प्रार्थना की। तब भगवागन विष्णु ने वाराह नाम का अवतार लिया। इस अवतार से विष्णु ने पृथ्वी को पाताल से बाहर लाकर समुद्र तल पर हिरण्याक्ष का वध किया। हिरण्याक्ष की मौत से दुखी उसके भाई हिरण्याकश्यप ने भगवान विष्णु को पराजित करने के ठानी और भगवान ब्रह्माजी की तपस्या कर वरदान प्राप्त किया।

दिन में ना मार सके ना रात, ना बाहर तो ना भीतर, ना अस्त्र ना ही सस्त्र से मारा जा सके। ब्रह्मा से ये वरदान पाकर हिरण्याकश्यप मृत्यु से अभय हो गया। अब हिरण्याकश्यप खुद को भगवान से बड़ा समझने लगा और तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा। हिरण्याकश्यप ने अपने राज्य में भगवान विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया। लेकिन हिरण्याकश्प के पुत्र प्रह्लाद बचपने से भगवान विष्णु के भक्त थे। हिरण्यकश्यप ने पुत्र को विष्णु भगवान की पूजा करने से मना किया। पिता के क्रोध के बावजूद प्रहलाद की विष्णु भक्ति बंद नहीं हुई, वह विष्णु का जाप करता रहा। प्रहलाद को विष्णु भक्ती से वंचित करने के लिए हिरण्यकश्यप ने कई तरह की प्रताड़नाएं दीं लेकिन प्रहलाद ने विष्णु भक्ति नहीं छोड़ी। इससे क्रोधित होकर हिरण्यकश्प ने बहन होलिका से कहा कि वह प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर जलती हुई आग में बैठ जाए। जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो अपने वरदान का उपयोग अधर्म के लिए करने से होलिका जलकर राख हो गई। वहीं प्रहलाद भगवान विष्णु के नाम के जाप करते हुए अग्नि से बाहर निकल आए। जिस दिन होलिका जली वह फाल्गुन माह की पूर्णिमा का दिन था। इसीलिए होली फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है।

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