संसद संबोधन से पहले बहिष्कार की तैयारी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार को इसराइल दौरे पर जा रहे हैं। इस दौरान वे इसराइली संसद Knesset को संबोधित करने वाले हैं। लेकिन उनके भाषण से पहले ही इसराइल की घरेलू राजनीति में विवाद खड़ा हो गया है। इसराइल के विपक्ष ने संसद सत्र के बहिष्कार की चेतावनी दी है।
विवाद की जड़ क्या है?
रिपोर्ट्स के अनुसार, केनेस्सेट स्पीकर Amir Ohana ने सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष Isaac Amit को विशेष सत्र में आमंत्रित नहीं किया। परंपरा के अनुसार, ऐसे औपचारिक सत्रों में सुप्रीम कोर्ट प्रमुख को बुलाया जाता है। निमंत्रण न भेजे जाने को विपक्ष न्यायपालिका के साथ टकराव के रूप में देख रहा है।
विपक्ष की नाराज़गी
इसराइल के विपक्षी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री Yair Lapid ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से हस्तक्षेप की मांग की। लापिड ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट प्रमुख का बहिष्कार, विपक्ष का भी बहिष्कार है। उन्होंने कहा कि वे भारत को शर्मिंदा नहीं करना चाहते और नहीं चाहते कि 1.4 अरब लोगों के देश के प्रधानमंत्री आधी खाली संसद को संबोधित करें।
ओहाना का जवाब
अमीर ओहाना ने विपक्ष की बहिष्कार धमकी को “राजनीतिक हथियार” बताया। उन्होंने कहा कि भारत जैसे महत्वपूर्ण साझेदार के साथ इसराइल के संबंधों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब अन्य विश्व नेताओं के भाषणों में भी सुप्रीम कोर्ट प्रमुख को नहीं बुलाया गया, तब विपक्ष ने बहिष्कार क्यों नहीं किया।
न्यायपालिका बनाम सरकार टकराव
यह विवाद व्यापक न्यायिक सुधार बहस से जुड़ा है। नेतन्याहू सरकार सुप्रीम कोर्ट और अटॉर्नी जनरल के अधिकारों में बदलाव के लिए विधायी कदम उठा रही है। जनवरी 2025 में आइज़ैक अमीत के चीफ जस्टिस बनने के बाद से सरकार और न्यायपालिका के बीच तनाव बढ़ा है। राष्ट्रपति Isaac Herzog भी पहले संसद में संबोधन के दौरान अमीत को उचित पदनाम न दिए जाने पर आपत्ति जता चुके हैं।
मोदी का दूसरा इसराइल दौरा
यह प्रधानमंत्री मोदी की इसराइल की दूसरी यात्रा है। भारत और इसराइल के बीच रक्षा, तकनीक और कृषि जैसे क्षेत्रों में मजबूत साझेदारी है। हालांकि इस बार उनका दौरा इसराइल की आंतरिक राजनीतिक खींचतान के बीच हो रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति भारत-इसराइल संबंधों से ज्यादा इसराइल की घरेलू राजनीति का परिणाम है।
क्या होगा असर?
- अगर विपक्ष बहिष्कार करता है तो संसद आंशिक रूप से खाली दिख सकती है।
- इससे इसराइल की आंतरिक राजनीति का संदेश अंतरराष्ट्रीय मंच पर जाएगा।
- हालांकि दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर तत्काल असर की संभावना कम मानी जा रही है।
