एयरफोर्स के पास 13 स्क्वाड्रन कम, चीन-पाकिस्तान से दो मोर्चों की चुनौती
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं मानी जा रही है। इसके साथ 3.60 लाख करोड़ रुपए की 114 राफेल फाइटर जेट की संभावित डील जुड़ी हुई है। यह डील भारतीय वायुसेना के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है। क्योंकि मौजूदा समय में एयरफोर्स स्क्वाड्रन की गंभीर कमी से जूझ रही है।
भारतीय वायुसेना को दो मोर्चों यानी चीन और पाकिस्तान से संभावित खतरे को ध्यान में रखते हुए 42.5 स्क्वाड्रन की मंजूरी दी गई है। हालांकि इस समय केवल करीब 29 स्क्वाड्रन ही ऑपरेशनल हैं। यानी वायुसेना के पास लगभग 13 स्क्वाड्रन की कमी है। इतना ही नहीं, आने वाले 10 वर्षों में कई पुराने लड़ाकू विमान रिटायर हो जाएंगे।
पुराने फ्लीट की रिटायरमेंट से बढ़ेगी चुनौती
भारतीय वायुसेना के मौजूदा बेड़े में शामिल SEPECAT Jaguar, MiG-29 और Mirage 2000 जैसे विमान चरणबद्ध तरीके से रिटायर होंगे। इससे स्क्वाड्रन की संख्या और घट सकती है। इसलिए नए मल्टी-रोल फाइटर जेट्स की तुरंत जरूरत महसूस की जा रही है।
114 राफेल की डील इसी कमी को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। यदि यह डील समय पर पूरी होती है, तो स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ को स्थिर करने में मदद मिल सकती है। साथ ही तकनीकी बढ़त भी हासिल की जा सकती है।
चीन और पाकिस्तान की एयर पावर कितनी मजबूत
चीन तेजी से अपनी एयर पावर को आधुनिक बना रहा है। उसके पास पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट्स पहले से मौजूद हैं और वह छठी पीढ़ी की तकनीक पर भी काम कर रहा है। वहीं पाकिस्तान को भी पांचवीं पीढ़ी के जेट मिलने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का सवाल अहम हो जाता है।
भारत ने पहले 36 राफेल विमानों को अपने बेड़े में शामिल किया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल 36 विमान पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए 114 राफेल की संभावित डील को गेम चेंजर के रूप में देखा जा रहा है।
कितने समय में पूरी होगी 42.5 स्क्वाड्रन की जरूरत
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, यदि नई डील जल्द फाइनल होती है और डिलीवरी समय पर शुरू होती है, तो अगले दशक में स्क्वाड्रन संख्या को संतुलित किया जा सकता है। हालांकि इसमें उत्पादन क्षमता, बजट और रणनीतिक प्राथमिकताएं अहम भूमिका निभाएंगी।
स्पष्ट है कि 114 Rafale fighter deal केवल एक रक्षा खरीद नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक एयर स्ट्रैटजी का अहम हिस्सा है।
