फ्री बलूचिस्तान मूवमेंट के नेता ने कहा, आसिम मुनीर भारत को बदनाम कर बलूचिस्तान में हो रहे अत्याचारों से ध्यान भटका रहे हैं
बलूचिस्तान में जारी हिंसा, मानवाधिकार उल्लंघन और सशस्त्र संघर्ष को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बहस तेज हो गई है। इसी बीच फ्री बलूचिस्तान मूवमेंट से जुड़े प्रतिनिधि, लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता मीर यार बलोच ने पाकिस्तान और उसकी सेना पर गंभीर आरोप लगाए हैं। न्यूज़ 18 से एक्सक्लूसिव बातचीत में उन्होंने कहा कि अगर बलूचिस्तान को सीमित सैन्य संसाधन भी मिल जाएं, तो हालात बहुत तेजी से बदल सकते हैं। मीर यार बलोच ने दावा किया कि फाइटर जेट और आधुनिक हथियार मिलने की स्थिति में बलूचिस्तान एक हफ्ते के भीतर आज़ाद हो सकता है। उनके मुताबिक, पाकिस्तान की सेना के पास आधुनिक तकनीक जरूर है, लेकिन बलूच जनता का समर्थन नहीं है। यही कारण है कि संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच रहा है।
1948 का विलय या जबरन कब्ज़ा?
मीर यार बलोच ने पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 27 मार्च 1948 को बलूचिस्तान का पाकिस्तान में विलय स्वैच्छिक नहीं, बल्कि सैन्य दबाव में कराया गया था। उनके अनुसार, बलूच संसद के दोनों सदनों ने पाकिस्तान में शामिल होने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, इसके बावजूद सैन्य कार्रवाई की गई।
मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप
उन्होंने कहा कि बलूचिस्तान में दशकों से जबरन गायब करने, गैर-न्यायिक हत्याओं और यातनाओं का सिलसिला जारी है। मीर यार बलोच का दावा है कि पाकिस्तान की सेना ने केवल एक साल में हजारों ऑपरेशन किए, जिससे आम नागरिकों में डर का माहौल बना हुआ है। इसके साथ ही इंटरनेट बंद करना और विरोध को दबाना आम बात बन गई है।
CPEC और संसाधनों के शोषण का मुद्दा
CPEC को लेकर भी उन्होंने पाकिस्तान पर निशाना साधा। उनका कहना है कि इस परियोजना के नाम पर बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का शोषण हो रहा है, जबकि स्थानीय लोगों को विकास का लाभ नहीं मिल रहा। उन्होंने सुझाव दिया कि भविष्य में इसे एक नए ट्रेड कॉरिडोर के रूप में देखा जाना चाहिए।
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
मीर यार बलोच ने यह भी कहा कि बलूच आंदोलन में महिलाओं की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। उनके अनुसार, लंबे समय से हो रहे अत्याचारों ने महिलाओं को भी संघर्ष में आगे आने पर मजबूर किया है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वे बलूचिस्तान में हो रहे कथित मानवाधिकार उल्लंघनों पर गंभीरता से ध्यान दें। उनका कहना है कि अगर वैश्विक स्तर पर हस्तक्षेप हुआ, तो क्षेत्र में स्थायी शांति संभव है।
