रणनीतिक साझेदारी के दावों के बीच इंटरऑपरेबिलिटी की सीमाएं उजागर, फिर भी दो-मोर्चे के खतरे से इनकार नहीं
‘ऑल-वेदर’ साझेदारी की वास्तविकता
Pakistan और China के बीच ‘ऑल-वेदर स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ का जिक्र अक्सर होता है। हालांकि, जब इस रिश्ते को सैन्य मानकों पर परखा जाता है, तो तस्वीर उतनी मजबूत नहीं दिखती। दरअसल, किसी भी गहरे सैन्य गठबंधन की असली कसौटी इंटरऑपरेबिलिटी होती है। यानी साझा सैन्य सिद्धांत, एकीकृत कमांड सिस्टम और तकनीकी तालमेल। इस पैमाने पर चीन-पाक संबंध अभी नाटो जैसे स्तर से काफी दूर हैं।
इंटरऑपरेबिलिटी की बड़ी कमी
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) केंद्रीकृत और पार्टी-नियंत्रित कमांड सिस्टम पर काम करती है। वहीं पाकिस्तान का रक्षा ढांचा सेना-केंद्रित और खंडित है। संयुक्त अभ्यास जरूर होते हैं। लेकिन वे सामरिक पहचान तक सीमित रहते हैं। रणनीतिक एकीकरण अभी भी अधूरा है। तकनीकी स्तर पर भी चुनौतियां हैं। पाकिस्तान के पास चीनी और पश्चिमी हथियारों का मिश्रण है। उदाहरण के तौर पर, उसके पास J-10C लड़ाकू विमान हैं। साथ ही अमेरिकी F-16 Fighting Falcon भी मौजूद हैं। इन अलग-अलग प्रणालियों के डेटा लिंक और मेंटेनेंस सिस्टम मेल नहीं खाते। इससे संयुक्त कमांड और कंट्रोल सिस्टम बनाना मुश्किल हो जाता है।
ऑपरेशन सिंदूर में खुली परतें
मई 2025 के भारत-पाक संघर्ष, जिसे ‘ऑपरेशन सिंदूर’ कहा गया, के दौरान यह अंतर साफ दिखा। पाकिस्तान ने चीनी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया। लेकिन सहयोग सीमित और परिस्थितिजन्य रहा। चीन ने बेइडो सैटेलाइट सिस्टम के जरिए सहायता दी। हालांकि, इसे पूर्ण सैन्य एकीकरण नहीं कहा जा सकता। इस दौरान सोशल मीडिया पर Dassault Rafale को लेकर भी दुष्प्रचार के आरोप लगे। इससे सूचना युद्ध की नई परत भी सामने आई।
क्यों जरूरी है भारत की सतर्कता?
चीन और पाकिस्तान दोनों औपचारिक सैन्य संधि से बचते रहे हैं। क्योंकि खुला गठबंधन उन्हें बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में सीधे खींच सकता है। फिर भी भारत के लिए खतरा खत्म नहीं हुआ है। सीमित लेकिन समन्वित सहयोग भी चुनौती बन सकता है। खासकर दो-मोर्चे की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए भारत को अपनी रक्षा रणनीति, संसाधन प्रबंधन और इंटरऑपरेबिलिटी पर लगातार काम करना होगा। साथ ही तकनीकी और साइबर मोर्चे पर भी सतर्क रहना जरूरी है।
