रंगों से दूरी, परंपरा से जुड़ी आस्था और इतिहास की दर्दभरी कहानी
झारखंड के बोकारो जिले में एक ऐसा गांव है, जहां होली नहीं मनाई जाती। देशभर में जहां रंग और गुलाल उड़ते हैं।
वहीं, दुर्गापुर गांव में सन्नाटा पसरा रहता है यह गांव कसमार प्रखंड में स्थित है। करीब 1700 लोग यहां रहते हैं। दुर्गापुर पंचायत के 11 टोलों में यह परंपरा एक जैसी निभाई जाती है। होली के दिन न रंग खेला जाता है। न पिचकारी चलती है। न ही घरों में पकवान बनते हैं। पूरा गांव सामान्य दिनों की तरह शांत रहता है।
राजाओं की रंजिश से जुड़ी परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा करीब 200 साल पुरानी है। बताया जाता है कि दुर्गापुर के राजा दुर्गा प्रसाद और रामगढ़ के राजा दलेल सिंह के बीच दुश्मनी हो गई थी कहा जाता है कि एक घटना ने विवाद को भड़का दिया। इसके बाद संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में कई ग्रामीण मारे गए। राजा दुर्गा प्रसाद देव की भी हत्या कर दी गई। इसी शोक में गांव ने होली मनाना बंद कर दिया। तब से यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है।
‘बड़राव पहाड़ी बाबा’ से जुड़ी आस्था
गांव के लोग मानते हैं कि उनके देवता ‘बड़राव पहाड़ी बाबा’ को रंग पसंद नहीं है। ग्रामीणों का विश्वास है कि यदि होली मनाई गई तो अनहोनी हो सकती है। बुजुर्ग महिला बादली देवी बताती हैं कि उन्होंने कभी होली नहीं खेली। उनके अनुसार, गांव में इस दिन कोई उत्सव जैसा माहौल नहीं होता। सब लोग शांति से अपना दिन बिताते हैं। आज भी दुर्गापुर गांव अपनी इस परंपरा पर अडिग है। यही वजह है कि यह गांव पूरे इलाके में अलग पहचान रखता है।
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