मायके गई पत्नी को थप्पड़ ‘क्रूरता’ नहीं, गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Gujarat High Court building in Ahmedabad
गुजरात हाईकोर्ट ने क्रूरता और आत्महत्या उकसावे मामले में पति को बरी किया।

लगातार और असहनीय मारपीट के ठोस सबूत जरूरी; आत्महत्या से सीधा संबंध साबित न होने पर पति बरी

Gujarat High Court ने एक अहम फैसले में कहा है कि पत्नी के बिना बताए मायके में रात रुकने पर पति द्वारा थप्पड़ मारने की एक अकेली घटना को भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्रूरता साबित करने के लिए लगातार और असहनीय मारपीट के ठोस साक्ष्य आवश्यक हैं। इसलिए, पर्याप्त प्रमाण न होने पर पति को आरोपों से बरी कर दिया गया।

क्या कहा कोर्ट ने

जस्टिस Geeta Gopi ने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष को यह दिखाना होता है कि उत्पीड़न निरंतर और गंभीर था। साथ ही, धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप साबित करने के लिए आरोपी के कृत्य और आत्महत्या के बीच नजदीकी कारण संबंध होना चाहिए। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसा प्रत्यक्ष और निकट संबंध स्थापित नहीं किया जा सका। इसलिए, सजा टिक नहीं सकती।

पूरा मामला क्या था

यह फैसला दिलीपभाई मंगलाभाई वरली की अपील पर आया। उन्होंने 2003 में सेशंस कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने मई 1996 में पत्नी की आत्महत्या के मामले में उन्हें धारा 306 में सात साल और धारा 498ए में एक साल की सजा दी थी। हालांकि, अपील में बचाव पक्ष ने दलील दी कि दहेज मांग या उकसावे का कोई ठोस सबूत नहीं है। विवाद मुख्यतः पति के देर रात बैंजो बजाने के लिए बाहर जाने को लेकर होते थे। राज्य की ओर से सजा बरकरार रखने की मांग की गई। लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन लगातार क्रूरता, मेडिकल रिकॉर्ड या पूर्व शिकायतें पेश नहीं कर सका। परिणामस्वरूप, ट्रायल कोर्ट का फैसला पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में टिकाऊ नहीं पाया गया। इसलिए, अपील स्वीकार करते हुए पति को बरी कर दिया गया।

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