दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा– ऐसे मामलों में एक साल से पहले आपसी सहमति से तलाक से इनकार नहीं किया जा सकता
क्या है पूरा मामला
दिल्ली हाईकोर्ट ने शादी और तलाक से जुड़े कानून की व्याख्या करते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यदि शादी के बाद पति और पत्नी कभी साथ नहीं रहे हैं, तो शादी का रजिस्ट्रेशन केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। ऐसे मामलों में इसका इस्तेमाल एक साल से पहले तलाक से इनकार करने के लिए नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की डिवीजन बेंच ने एक महिला की याचिका पर सुनवाई के दौरान की।
फैमिली कोर्ट के आदेश को दी चुनौती
महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें शादी की तारीख से एक साल पूरा न होने के कारण आपसी सहमति से तलाक के लिए ज्वाइंट याचिका दाखिल करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था। याचिका में कहा गया कि दोनों पक्ष कभी एक दिन भी साथ नहीं रहे। इसके अलावा, शादी कभी पूरी नहीं हुई और विवाह के तुरंत बाद दोनों अपने-अपने माता-पिता के घरों में अलग-अलग रहने लगे थे।
फैमिली कोर्ट ने क्यों किया था इनकार
फैमिली कोर्ट ने हिंदू मैरिज एक्ट (HMA) की धारा 14 के तहत तलाक की अनुमति देने से इनकार किया था। कोर्ट का मानना था कि पक्ष असाधारण कठिनाई का मामला साबित नहीं कर पाए हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि शादी को बचाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए। फैमिली कोर्ट ने यह तर्क भी दिया कि शादी के तुरंत बाद हुआ रजिस्ट्रेशन असाधारण कठिनाई के दावे के खिलाफ जाता है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की इस दलील से असहमति जताई। कोर्ट ने माना कि यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है कि दोनों पक्ष कभी साथ नहीं रहे और शादी कभी पूर्ण ही नहीं हुई। इससे मौजूदा वैवाहिक रिश्ते की बुनियाद पर ही सवाल खड़े होते हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसी शादी को बनाए रखने पर जोर देना उचित नहीं है, जो केवल कागजों में मौजूद हो।
अनावश्यक कठिनाई पर टिप्पणी
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट का फैसला पक्षों को अनावश्यक मानसिक और सामाजिक कठिनाई सहने के लिए मजबूर करेगा। कोर्ट के अनुसार, यह मामला HMA की धारा 14 के तहत बनाए गए अपवाद के दायरे में आता है। इसी आधार पर अदालत ने दंपति की अर्जी को मंजूरी दी और उन्हें आपसी सहमति से तलाक के लिए अपनी ज्वाइंट याचिका पेश करने की अनुमति दे दी।
क्यों अहम है यह फैसला
यह फैसला उन मामलों के लिए राहत लेकर आया है, जहां शादी केवल कानूनी दस्तावेजों तक सीमित रह जाती है। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि अदालतें अब केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि रिश्ते की वास्तविक स्थिति को भी प्राथमिकता दे रही हैं।
