भारत–जापान संबंधों में विवेकानंद से टैगोर तक की भूमिका

एशियाटिक सोसाइटी कोलकाता में आयोजित भारत-जापान संबंधों पर व्याख्यान कार्यक्रम
एशियाटिक सोसाइटी में भारत-जापान सांस्कृतिक संबंधों पर आयोजित विशेष व्याख्यान।

परंपराओं का संप्रेषण’ विषय पर हुआ गहन विमर्श

जापान के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर एशियाटिक सोसाइटी ने अपने ऐतिहासिक पार्क स्ट्रीट परिसर में एक विशेष व्याख्यान आयोजित किया। कार्यक्रम का विषय था— ‘परंपराओं का संप्रेषण: जापान में भारत की सांस्कृतिक विरासत’। इस व्याख्यान में भारत और जापान के प्राचीन एवं आधुनिक संबंधों पर विस्तार से चर्चा हुई।

प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने रखा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

व्याख्यान नव नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने प्रस्तुत किया। उन्होंने भारतीय दर्शन और बौद्ध परंपराओं के जापान तक प्रसार का विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि मठीय संस्थानों का नेटवर्क, बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद और तीर्थ यात्राएं इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान की प्रमुख कड़ियां थीं। इन प्रयासों ने जापान की सांस्कृतिक चेतना को गहराई से प्रभावित किया।

आधुनिक काल में विवेकानंद और टैगोर की भूमिका

प्रो. सिंह ने आधुनिक दौर में संबंधों की निरंतरता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने स्वामी विवेकानंद और रवींद्रनाथ टैगोर के योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इन महापुरुषों ने भारत और जापान के बीच बौद्धिक संवाद को नई दिशा दी। उनके विचारों ने दोनों देशों के सांस्कृतिक रिश्तों को मजबूत आधार प्रदान किया।

स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा आयाम

व्याख्यान में सुभाष चंद्र बोस और रास बिहारी बोस की भूमिका का भी उल्लेख हुआ। जापान से जुड़े उनके प्रयासों ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दिया। प्रो. सिंह ने कहा कि भारत-जापान संबंध केवल आध्यात्मिक या सांस्कृतिक नहीं हैं। यह औपनिवेशिक विरोध और सहयोग की साझा विरासत का भी प्रतीक हैं।

अकादमिक संवाद की प्रासंगिकता

कार्यक्रम में भारत-जापान अध्ययन से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। व्याख्यान के बाद संवाद सत्र भी आयोजित किया गया। संवाद में दोनों देशों के प्राचीन सभ्यतागत संबंधों की निरंतरता पर बल दिया गया।
साथ ही यह रेखांकित किया गया कि अकादमिक सहयोग भविष्य में द्विपक्षीय संबंधों को और सुदृढ़ कर सकता है।

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