कम खर्च, तेज रिजल्ट और इंसान से 70% जेनेटिक समानता ने बढ़ाई वैज्ञानिक उम्मीदें
आयुर्वेदिक रिसर्च में आया बड़ा बदलाव
आयुर्वेदिक दवाओं की वैज्ञानिक पुष्टि की दिशा में जयपुर से बड़ी पहल सामने आई है। राजधानी स्थित राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान ने देश में पहली बार जेब्राफिश पर आयुर्वेदिक दवाओं का प्री-क्लिनिकल ट्रायल शुरू किया है। अब तक चूहा, खरगोश और बंदर जैसे जीवों पर होने वाले परीक्षणों के बाद यह कदम रिसर्च को नई गति देने वाला माना जा रहा है।
क्यों खास है जेब्राफिश मॉडल
जेब्राफिश एक छोटी मीठे पानी की मछली है, जिसका वैज्ञानिक नाम Danio rerio है। यह करीब दो इंच लंबी होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इंसान और जेब्राफिश के जीन लगभग 70 प्रतिशत तक समान हैं। यही वजह है कि इस पर होने वाले परीक्षण इंसानी शरीर के प्रभावों को बेहतर ढंग से दर्शाते हैं।
पारदर्शी भ्रूण से बढ़ी रिसर्च की सटीकता
जेब्राफिश के भ्रूण पारदर्शी होते हैं। इससे माइक्रोस्कोप के जरिए यह साफ देखा जा सकता है कि आयुर्वेदिक दवा हृदय, मस्तिष्क या अन्य अंगों पर कैसे असर कर रही है। इससे रिसर्च की एक्यूरेसी और विश्वसनीयता दोनों बढ़ जाती हैं।
कम समय और कम लागत में बेहतर नतीजे
अन्य जीवों की तुलना में जेब्राफिश का विकास बेहद तेज होता है। इसके अंग 24 से 48 घंटे में विकसित होने लगते हैं। एक साथ 100 से ज्यादा अंडे देने की क्षमता के कारण बड़े स्तर पर ट्रायल संभव हो पाते हैं। चूहों और बंदरों की तुलना में इसका रख-रखाव भी काफी सस्ता है।
प्री-क्लिनिकल ट्रायल का महत्व
किसी भी नई दवा को बाजार में लाने से पहले प्री-क्लिनिकल ट्रायल जरूरी होता है। इस चरण में दवा की सुरक्षा, खुराक और अंगों पर असर को परखा जाता है। इसके बाद ही इंसानों पर क्लिनिकल ट्रायल किया जाता है। जेब्राफिश इस पहले चरण को आसान और तेज बना रही है।
अंतरराष्ट्रीय मान्यता की ओर आयुर्वेद
राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के रस शास्त्र विभाग के एचओडी डॉ. अनुपम श्रीवास्तव के अनुसार, जेब्राफिश मॉडल से मिलने वाला डेटा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयुर्वेद को वैज्ञानिक स्वीकार्यता दिलाने में मदद करेगा। उन्होंने बताया कि आयुर्वेदिक दवाओं पर न्यूरो-डिजनरेटिव और क्रॉनिक डिजीज से जुड़े कई ट्रायल जारी हैं।
स्टूडेंट्स को भी मिल रहा रिसर्च का मौका
संस्थान में एमडी और पीएचडी स्कॉलर्स को जेब्राफिश मॉडल अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। हाल ही में एक छात्र स्पर्म जनरेशन पर आधारित प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। इससे आयुर्वेदिक रिसर्च को नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
