50 हफ्तों तक चली ‘कभी कभी’, चेतावनियों के बावजूद बनी कल्ट क्लासिक

1976 की फिल्म कभी कभी का पोस्टर और अमिताभ बच्चन का रोमांटिक सीन।
चेतावनियों के बावजूद 50 हफ्तों तक थिएटर्स में चली ‘कभी कभी’।

अमिताभ बच्चन की रूमानी फिल्म ने बदली इमेज, यश चोपड़ा के फैसले ने रचा इतिहास

मुंबई: आज जब वेलेंटाइन डे का शोर है, तब 50 साल पहले का दौर अलग था। तब हर दिन प्यार का दिन होता था। 27 फरवरी 1976 को रिलीज हुई Kabhi Kabhie इसी दौर की याद दिलाती है। इस फिल्म ने न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर कमाल किया, बल्कि 50 हफ्तों तक थिएटर्स में चलकर इतिहास रच दिया।

चेतावनी के बावजूद लिया बड़ा फैसला

फिल्म के निर्देशक Yash Chopra उस समय इंडस्ट्री के दिग्गज बन चुके थे। ‘दाग’, ‘दीवार’ और ‘इत्तेफाक’ जैसी सफल फिल्मों के बाद उन्होंने रूमानी कहानी पर दांव लगाया हालांकि उन्हें चेतावनी दी गई थी। कहा गया कि Amitabh Bachchan ‘एंग्री यंग मैन’ की छवि में हैं। उनकी रोमांटिक फिल्म शायद न चले। लेकिन यश चोपड़ा ने जोखिम उठाया। नतीजा सामने था। फिल्म सुपरहिट हुई और कल्ट का दर्जा हासिल कर गई।

नज्म से जन्मी थी कहानी

‘कभी कभी’ का विचार साहिर लुधियानवी की नज्म से आया। प्यार में बिछड़े दो लोग। सालों बाद फिर आमना-सामना। यही भावनात्मक धागा फिल्म की आत्मा बना। कहानी को विस्तार यश चोपड़ा की पत्नी पामेला चोपड़ा ने दिया। संवाद सागर सरहदी ने लिखे। फिल्म की शायरी आज भी याद की जाती है।

50 हफ्तों का रिकॉर्ड

फिल्म मुंबई के मेट्रो टॉकीज में रिलीज हुई। वहां 26 हफ्ते चली। इसके बाद मराठा मंदिर में मेटिनी शो में दिखाई गई। इस तरह फिल्म लगातार 50 हफ्तों तक चलती रही। यह उपलब्धि उस दौर में बेहद बड़ी मानी जाती थी।

संगीत बना आत्मा

संगीतकार खैयाम को उस समय ‘अनलकी’ कहा जा रहा था। फिर भी यश चोपड़ा ने उन्हीं को चुना। कभी कभी मेरे दिल में’, ‘मैं पल दो पल का शायर हूं’ और ‘मेरे घर आई एक नन्हीं परी’ जैसे गीत आज भी अमर हैं। फिल्म को कई फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले। स्पष्ट है कि ‘कभी कभी’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी। यह सेलुलाइड पर रची गई एक कविता थी। और आज भी वही जादू बरकरार है।

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