केरल नहीं, अब कहिए ‘केरलम’: केंद्र ने क्यों तुरंत दी मंजूरी?

केरल का नाम बदलकर केरलम करने के फैसले पर राजनीतिक चर्चा
केंद्र सरकार ने केरल का नाम बदलकर केरलम करने के प्रस्ताव को दी मंजूरी

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नई दिल्ली और तिरुवनंतपुरम से बड़ी खबर आई है। अब आधिकारिक तौर पर ‘केरल’ को ‘केरलम’ कहा जाएगा। केंद्रीय कैबिनेट ने राज्य सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। प्रस्ताव में संविधान की पहली अनुसूची और सभी आधिकारिक भाषाओं में नाम बदलने की मांग की गई थी। यह फैसला ऐसे समय आया है जब राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। इसलिए इस निर्णय के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं।

प्रस्ताव किसने भेजा था?

यह प्रस्ताव केरल की वामपंथी सरकार ने भेजा था। मुख्यमंत्री Pinarayi Vijayan के नेतृत्व वाली LDF सरकार ने विधानसभा में नाम बदलने का प्रस्ताव रखा था। 24 जून 2024 को विधानसभा ने इसे सर्वसम्मति से पास कर दिया। यानी सत्ताधारी LDF और विपक्षी UDF दोनों इस पर एकमत थे। जब पूरा सदन एक साथ खड़ा हो, तब केंद्र के लिए प्रस्ताव को नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाता है।

केंद्र ने तुरंत मंजूरी क्यों दी?

सबसे बड़ा कारण टाइमिंग है। अप्रैल-मई में राज्य में चुनाव होने हैं। बीजेपी लंबे समय से दक्षिण भारत में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। अगर केंद्र प्रस्ताव को रोकता, तो विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बना सकता था। यह कहा जाता कि केंद्र मलयालम भाषा और क्षेत्रीय पहचान का सम्मान नहीं करता। लेकिन मंजूरी देकर केंद्र ने यह मुद्दा विपक्ष के हाथ से छीन लिया। अब बीजेपी यह संदेश दे सकती है कि वह राज्य की संस्कृति का सम्मान करती है।

‘केरलम’ शब्द का मतलब क्या है?

मलयालम भाषा में लोग हमेशा से अपने राज्य को ‘केरलम’ कहते आए हैं। यह कोई नया नाम नहीं है। बल्कि यही मूल नाम माना जाता है। एक मान्यता है कि ‘केरलम’ शब्द ‘केरा’ यानी नारियल से जुड़ा है। क्योंकि यह राज्य नारियल के पेड़ों के लिए प्रसिद्ध है। दूसरी थ्योरी के अनुसार, यह शब्द प्राचीन चेरा वंश से जुड़ा है।

फिर ‘केरल’ नाम कैसे पड़ा?

1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के दौरान मलयालम भाषी क्षेत्रों को मिलाकर नया राज्य बनाया गया। अंग्रेजी में इसका नाम ‘Kerala’ लिखा गया। बाद में हिंदी में इसे ‘केरल’ कहा जाने लगा। हालांकि, स्थानीय लोग अपनी मातृभाषा में ‘केरलम’ ही बोलते रहे। अब यह बदलाव उनकी पुरानी मांग को पूरा करने वाला माना जा रहा है। यह फैसला सिर्फ नाम बदलने का नहीं है। यह पहचान और सांस्कृतिक सम्मान का सवाल भी है।

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