लंढौरा के ‘चैंपियन’ का शाही रंगमहल

लंढौरा के रंगमहल के बाहर कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन की तस्वीर
50 कमरों वाले रंगमहल और शाही विरासत के साथ उत्तराखंड की राजनीति में चर्चित चेहरा।

खेल से राजनीति तक, उपलब्धियां और विवाद साथ-साथ

उत्तराखंड की राजनीति में कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन एक ऐसा नाम है जो हमेशा चर्चा में रहा। वे लंढौरा राजघराने की विरासत से आते हैं। साथ ही उनकी पहचान 350 कमरों वाले ‘रंगमहल’ से भी जुड़ी रही है। रुड़की के पास स्थित उनका पारिवारिक आवास ‘रंगमहल’ शाही ठाठ का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि राजनीति से इतर उनकी जीवनशैली भी सुर्खियों में रहती है।

राजघराने की विरासत और रंगमहल की पहचान

कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन लंढौरा की गुर्जर रियासत के राजपरिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनका बचपन शाही माहौल में बीता। उनके पिता राजा नरेंद्र सिंह भी लक्सर से विधायक रहे। यहीं से उन्हें राजनीति की प्रेरणा मिली। ‘रंगमहल’ लंबे समय से चर्चा का केंद्र रहा है। इसे उनकी पारंपरिक हैसियत और प्रभाव का प्रतीक माना जाता है।

खेल से मिली ‘चैंपियन’ पहचान

राजनीति में आने से पहले उन्होंने खेल को करियर बनाया। उन्होंने कुश्ती और आर्म रेस्लिंग में राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते। 1989 से 1994 के बीच उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। यहीं से उन्हें ‘चैंपियन’ नाम मिला। इसके बाद 1995 में उन्होंने सक्रिय खेल जीवन छोड़ा। फिर सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हो गए।

निर्दलीय जीत से चार बार विधायक

2002 में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लक्सर से जीत दर्ज की। यह उनकी राजनीतिक शुरुआत थी। फिर 2007 में कांग्रेस से चुनाव जीता। 2012 में खानपुर सीट से विधायक बने। इसके बाद 2017 में भाजपा के टिकट पर चौथी बार जीत हासिल की। इस दौरान उन्हें वन विकास निगम का अध्यक्ष भी बनाया गया। इस पद को कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त था।

संपत्ति और पारिवारिक सक्रियता

2017 के हलफनामे में उन्होंने लगभग 1.88 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की। इसमें 12 एकड़ कृषि भूमि और देहरादून का मकान शामिल है। उनकी पत्नी देवयानी सिंह भी राजनीति में सक्रिय रही हैं। वहीं उनके बेटे दिव्य प्रताप सिंह ने अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी में स्वर्ण पदक जीतकर परिवार का नाम रोशन किया।

विवादों से घिरा रहा सफर

हालांकि उनका करियर विवादों से भी अछूता नहीं रहा। 2016 में उन्होंने कांग्रेस सरकार के खिलाफ बगावत की। बाद में भाजपा में शामिल हुए। 2019 में हथियारों के साथ वीडियो वायरल हुआ। इसके बाद उन्हें पार्टी से निष्कासित किया गया।
हालांकि बाद में माफी के बाद वापसी भी हुई। 2026 में नोट उड़ाने का वीडियो फिर चर्चा में आया। समर्थकों ने इसे जश्न बताया। विरोधियों ने इसे राजनीतिक मर्यादा के खिलाफ कहा।इसी विरोधाभास ने उनकी छवि को हमेशा सुर्खियों में बनाए रखा।

Read More :- रिंकू सिंह के पिता को स्टेज-4 लिवर कैंसर