अब वैज्ञानिक समझेंगे बारिश का पूरा गणित
अमेरिका की Brookhaven National Laboratory में वैज्ञानिकों ने बड़ा कारनामा किया है। यह लैब United States Department of Energy के अधीन काम करती है। यहां शोधकर्ताओं ने लैब के अंदर असली बादल पैदा कर दिया। इस उपलब्धि को ‘बर्थ ऑफ अ क्लाउड’ कहा जा रहा है। जब हरी लेजर लाइट के बीच छोटे कण तैरने लगे, तब एक धुंधली आकृति उभरी। और फिर देखते ही देखते वह बादल में बदल गई। यह मौसम विज्ञान में बड़ी छलांग मानी जा रही है।
कैसे बना डिब्बे में बादल
वैज्ञानिकों ने एक ‘कन्वेक्शन क्लाउड चैंबर’ तैयार किया है। यह एक क्यूबिक मीटर का मेटल बॉक्स है। इसके अंदर तापमान और नमी को नियंत्रित किया जाता है। सबसे पहले बॉक्स के निचले हिस्से में पानी गर्म किया जाता है। गर्म पानी भाप बनकर ऊपर उठता है। ऊपरी हिस्सा बेहद ठंडा रखा जाता है। जब गर्म और ठंडी हवा मिलती है, तो ‘सुपरसैचुरेशन’ बनता है। इसके बाद एरोसोल कण डाले जाते हैं।ये कण बादलों के बीज की तरह काम करते हैं। भाप इन कणों पर जमने लगती है। और फिर लैब में बादल तैरने लगता है।
क्यों जरूरी है यह रिसर्च
बादल धरती के ऊर्जा संतुलन को नियंत्रित करते हैं। वे तय करते हैं कि कितनी गर्मी आएगी और कितनी लौटेगी। लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं था कि कुछ बादल बारिश क्यों करते हैं। पहले वैज्ञानिक विमानों से बादलों के बीच जाकर डेटा जुटाते थे।हालांकि, यह तरीका जटिल था। अब इस चैंबर में घंटों तक एक ही बादल पर अध्ययन किया जा सकेगा।
क्या बदलेगी मौसम भविष्यवाणी
इस ‘क्लाउड इन अ बॉक्स’ में कई कंट्रोल बटन हैं। तापमान, नमी और टर्बुलेंस को बदला जा सकता है। साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी उपयोग हो रहा है। लेजर और रडार तकनीक से बादल की अंदरूनी गतिविधि मापी जाएगी। इससे बेहतर वेदर मॉडल तैयार होंगे। और सूखा व बाढ़ जैसी समस्याओं को समझना आसान होगा।
सिर्फ बादल नहीं, और भी फायदे
यह तकनीक सिर्फ बारिश तक सीमित नहीं है। इससे हवा में फैलने वाले पराग कणों का अध्ययन होगा। साथ ही खतरनाक बैक्टीरिया और वायरस की ट्रैवलिंग भी समझी जा सकेगी। कुल मिलाकर, यह ‘Lab created cloud experiment’ भविष्य की जलवायु चुनौतियों से निपटने की नई उम्मीद है।
