ब्रज की होली की शुरुआत और प्राचीन परंपराओं का अद्भुत संगम
फाल्गुन मास की मधुर हवाओं के साथ फुलेरा दूज का आगमन होता है। यह पर्व होली की औपचारिक शुरुआत माना जाता है। उत्तर भारत, विशेषकर ब्रज क्षेत्र में इसका विशेष महत्व है। साल 2026 में फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि 18 फरवरी 2026 को सायं 04:57 बजे प्रारंभ होगी। यह तिथि 19 फरवरी 2026 को दोपहर 03:58 बजे तक रहेगी। उदय तिथि के आधार पर 19 फरवरी को फुलेरा दूज मनाई जाएगी।
श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़ा पर्व
धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन से Krishna ने ब्रज में फूलों से होली खेलने की परंपरा आरंभ की थी। ‘फुलेरा’ शब्द ‘फूल’ से बना है। इसी कारण इस दिन रंगों की जगह फूलों से होली खेली जाती है। Mathura और Vrindavan के मंदिरों में भव्य आयोजन होते हैं। Radha-कृष्ण की प्रतिमाओं को रंग-बिरंगे पुष्पों से सजाया जाता है। भजन-कीर्तन से वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
क्या होती हैं ‘गुलरियां’?
ग्रामीण ब्रज में फुलेरा दूज से एक विशेष परंपरा शुरू होती है। इसे ‘गुलरियां’ कहा जाता है। गुलरियां गाय के गोबर से बनाई जाती हैं। इन्हें गोल आकार दिया जाता है। बीच में एक छेद किया जाता है। सूखने के बाद इन्हें धागे में पिरोया जाता है। इस तरह ‘गुलरियों की माला’ तैयार होती है। आगे चलकर इन्हें होलिका दहन में अर्पित किया जाता है। यह परंपरा सामूहिक सहभागिता का प्रतीक मानी जाती है।
पूजा और फूलों की होली
इस दिन घरों और मंदिरों में विशेष पूजा की जाती है। पीले वस्त्र धारण कर राधा-कृष्ण की आराधना की जाती है। मिष्ठान्न और फल का भोग लगाया जाता है। फिर फूलों की वर्षा के साथ होली खेली जाती है। गलियों में फूलों की रंगोली सजाई जाती है। यह वसंत ऋतु के स्वागत का संकेत है।
ब्रज में उमड़ती श्रद्धा
ब्रजभूमि में इस दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। मंदिरों में संगीत और भक्ति का संगम दिखाई देता है। फुलेरा दूज केवल एक धार्मिक तिथि नहीं है। यह प्रेम, सौहार्द और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है। इसी के साथ होली के रंगोत्सव की शुरुआत होती है। 2026 में भी यह पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। फूलों की इस होली से ब्रज की परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठेगी।
