कलम बनी क्रांति की चिंगारी

शहीद पत्रकार पंडित रामदहीन ओझा का चित्र और बलिया की ऐतिहासिक झलक
अपनी लेखनी से अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने वाले शहीद पत्रकार रामदहीन ओझा

अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने वाले शहीद पत्रकार की कहानी

उत्तर प्रदेश के बलिया की धरती को ‘बागी बलिया’ कहा जाता है। यही धरती शहीद पत्रकार पंडित रामदहीन ओझा की कर्मभूमि रही। उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ कलम से जंग छेड़ी। और अंत तक डटे रहे।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

रामदहीन ओझा का जन्म 17 फरवरी 1901 को बांसडीह क्षेत्र में हुआ। बचपन से ही उनमें देशभक्ति की भावना थी। वे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते थे। यही स्वभाव आगे चलकर उनकी पहचान बना। इसके बाद उन्होंने पत्रकारिता का रास्ता चुना। और फिर कोलकाता का रुख किया।

पत्रकारिता से अंग्रेजों पर प्रहार

कोलकाता में वे प्रसिद्ध अखबार हिंदी युगांतर के संपादक बने। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ तीखे लेख लिखे। उनकी भाषा सीधी और प्रभावशाली थी। इसलिए जनता पर गहरा असर पड़ा। बलिया और गाजीपुर में उनके भाषणों ने जोश भर दिया। लोग आजादी के लिए संगठित होने लगे। हालांकि इससे अंग्रेजी हुकूमत परेशान हो गई। नतीजतन उन्हें कई बार जेल भेजा गया।

जेल की यातना और शहादत

जेल में उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं। बताया जाता है कि उन्हें मीठा जहर भी दिया गया। इसके बाद उनकी हालत बिगड़ती चली गई। 18 फरवरी 1931 को उन्हें गंभीर अवस्था में बाहर लाया गया। और फिर रात के अंधेरे में छोड़ दिया गया। कुछ ही समय बाद उनका निधन हो गया।वे मात्र 30 वर्ष के थे।

बागी बलिया की विरासत

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से पहले ही बलिया ने अंग्रेजों को चुनौती दी थी। रामदहीन ओझा जैसे सेनानियों ने इस पहचान को मजबूत किया। आज भी उनकी स्मृति लोगों को प्रेरित करती है। उनकी कहानी यह बताती है कि कलम भी क्रांति ला सकती है। और सच्ची पत्रकारिता सत्ता से नहीं डरती।

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