रनवे पर तैयार थे F-35, उड़ान को तैयार B-2 बॉम्बर

Donald Trump halted Iran military strike
ईरान पर अमेरिकी हमले से पहले डोनाल्ड ट्रंप ने आखिरी वक्त पर फैसला बदला

एक फोन कॉल और टल गया महायुद्ध

16 जनवरी 2026 की तारीख दुनिया के लिए बेहद अहम मानी जा रही थी & माना जा रहा था कि मध्य पूर्व एक बार फिर बड़े युद्ध की ओर बढ़ चुका है।
अमेरिका में चर्चाएं तेज थीं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर सैन्य कार्रवाई का आदेश देने वाले हैं & हालात लगभग युद्ध जैसे बन चुके थे।
रनवे पर F-35 फाइटर जेट खड़े थे & B-2 बॉम्बर मिशन के लिए तैयार बताए जा रहे थे।

अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप ईरान की मौजूदा सत्ता को हटाने के मूड में थे & रजा पहलवी के साथ उनकी सीक्रेट मीटिंग भी हो चुकी थी।
ईरान में तख्तापलट का प्लान लगभग तैयार था।
लेकिन ऐन वक्त पर व्हाइट हाउस का रुख बदल गया।

अचानक बदला व्हाइट हाउस का फैसला

सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि आखिर ट्रंप जैसे नेता को किसने रोका।
जानकारी के मुताबिक अरब देशों की कूटनीति और एक खास फोन कॉल ने इस फैसले की दिशा बदल दी।
डोनाल्ड ट्रंप को सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का फोन आया & इसी कॉल ने हालात को पलट दिया।

सऊदी अरब को क्यों थी सबसे ज्यादा चिंता

वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप से संयम बरतने की अपील की।
सऊदी नेतृत्व को डर था कि अगर अमेरिका ने ईरान पर हमला किया तो जवाब सीमित नहीं रहेगा।
ईरान पूरे खाड़ी क्षेत्र में जवाबी कार्रवाई कर सकता था & अमेरिकी सैन्य ठिकाने भी निशाने पर आ सकते थे।

सबसे बड़ी चिंता एनर्जी मार्केट को लेकर थी।
तेल और गैस सप्लाई में जरा सी रुकावट भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला सकती थी।

अरब देशों की सामूहिक कूटनीति

सिर्फ सऊदी अरब ही नहीं बल्कि कतर, ओमान और मिस्र ने भी अमेरिका को हमला न करने की सलाह दी।
इन देशों का मानना था कि मध्य पूर्व पहले ही अस्थिर है & युद्ध हालात को बेकाबू बना सकता है।
डर था कि ईरान अपने समर्थक गुटों के जरिए पूरे इलाके में आग भड़का सकता है।

अरब दबाव में ट्रंप का यू-टर्न

कूटनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि अरब देशों की इस संगठित लॉबिंग ने ट्रंप को पीछे हटने पर मजबूर किया।
व्हाइट हाउस को समझ आ गया कि यह सिर्फ अमेरिका-ईरान का मामला नहीं रहेगा।
तेल कीमतें, वैश्विक व्यापार और अमेरिकी हित सब दांव पर लग सकते थे।

अमेरिका के भीतर भी दिखी नाराजगी

हालांकि इस फैसले से ट्रंप के खेमे में नाराजगी भी देखने को मिली।
फिर भी यह साफ हो गया कि अब मध्य पूर्व में सिर्फ सैन्य ताकत नहीं बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति भी अमेरिका की रणनीति तय कर रही है।

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