ग्रामीणों का आरोप, औने-पौने दाम में खरीदकर 20 गुना महंगे रेट पर बाहरी लोगों को बेची जा रही जमीन
सख्त भू-कानून के बावजूद जमीन की खुलेआम खरीद-फरोख्त
उत्तराखंड में लागू सख्त भू-कानून के बावजूद अल्मोड़ा जिले से चौंकाने वाले आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों का दावा है कि बाहरी लोगों को जमीन बेची जा रही है। यह सब खुलेआम और कथित तौर पर प्रशासन की जानकारी में हो रहा है।
औने-पौने दाम में खरीद, कई गुना महंगी बिक्री
ग्रामीणों के अनुसार खूंट, धामस और बलसा गांवों में जमीन 50 हजार से 1.5 लाख रुपये प्रति नाली में खरीदी जा रही है। इसके बाद वही जमीन बाहरी लोगों को 10 से 15 लाख रुपये प्रति नाली में बेची जा रही है। इस पूरे खेल में बिचौलियों की बड़ी भूमिका बताई जा रही है।
धमकी और मारपीट के गंभीर आरोप
सामने आए वीडियो में ग्रामीण बाहरी लोगों का विरोध करते नजर आते हैं। एक ग्रामीण का दावा है कि जमीन बचाने की कोशिश करने पर उसके साथ मारपीट की गई। उसके पैर और पसली तक तोड़ दी गई। साथ ही जान से मारने की धमकियां भी दी गईं।
गोल खाते की जमीन की रजिस्ट्री का आरोप
ग्रामीणों और वकीलों का कहना है कि कई जमीनें गोल खाते की हैं। इनका बंटवारा अब तक नहीं हुआ है। इसके बावजूद रजिस्ट्री कर दी गई। दावा है कि अब तक करीब 500 से 600 नाली जमीन बेची जा चुकी है।
अधिकारियों से भिड़े वकील, कार्रवाई की मांग
तीसरे वीडियो में हाईकोर्ट के वकील अधिकारियों से बहस करते दिख रहे हैं। वकील का आरोप है कि सड़क किनारे की जमीनों को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। इससे गांव के रास्ते तक बंद हो रहे हैं।
गांव में बैठक, प्रशासन पर दबाव
मामले को लेकर गांव में बैठक हुई। नायब तहसीलदार और पटवारी भी पहुंचे। ग्रामीणों ने निष्पक्ष जांच और दोषियों पर मुकदमा दर्ज करने की मांग की। चेतावनी दी गई कि कार्रवाई नहीं हुई तो जिलाधिकारी का घेराव किया जाएगा।
भू-कानून के नियम क्या कहते हैं
उत्तराखंड के 11 पहाड़ी जिलों में बाहरी व्यक्ति कृषि या बागवानी जमीन नहीं खरीद सकते। सिर्फ आवासीय उद्देश्य के लिए 250 वर्ग मीटर तक जमीन लेने की अनुमति है। नियम तोड़ने पर जमीन सरकार के कब्जे में जा सकती है।
ऐतिहासिक गांव में बढ़ी चिंता
यह वही क्षेत्र है जहां उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत का जन्म हुआ था। ऐसे ऐतिहासिक इलाके में जमीन का यह खेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो पहाड़ की जमीन हमेशा के लिए हाथ से निकल जाएगी।
