35 लाख में ‘बेटे की गारंटी’! दुबई से दिल्ली तक फैला लिंग चयन रैकेट

आईवीएफ लैब में भ्रूण की जेनेटिक जांच और दुबई-Delhi कनेक्शन का प्रतीकात्मक दृश्य
दुबई से संचालित आईवीएफ लिंग चयन रैकेट में 35 लाख में बेटे की गारंटी का दावा।

100 प्रतिशत बेटे की गारंटी दी जा सकती है।

दुबई के एक डॉक्टर ने कथित तौर पर दावा किया है कि आईवीएफ के जरिए 100 प्रतिशत बेटे की गारंटी दी जा सकती है। इसके लिए 30 से 35 लाख रुपए खर्च बताए गए। इतना ही नहीं, बातचीत में लड़की वाले भ्रूण को नष्ट करने की बात भी सामने आई। यह खुलासा एक स्टिंग बातचीत में हुआ। रिपोर्टर ने खुद को बेटे की चाह रखने वाले दंपती के रूप में पेश किया। इसके बाद पूरी प्रक्रिया समझाई गई।

दुबई से शुरू, दिल्ली तक नेटवर्क

दुबई में आईवीएफ सेंटर चलाने वाले डॉ. गौतम इलाहाबादिया ने वीडियो कॉल पर प्रक्रिया समझाई। उन्होंने कहा कि एडवांस जेनेटिक टेस्टिंग से लड़के का चयन संभव है। उन्होंने कई बार दुबई आने की बात कही। हालांकि, पासपोर्ट की समस्या बताने पर दिल्ली में ‘जुगाड़’ का संकेत भी दिया। यहीं से इस नेटवर्क का भारतीय कनेक्शन सामने आया। बाद में दिल्ली के एक बिचौलिए से संपर्क कराया गया। उसने दावा किया कि सीमित लोग ही यह काम करते हैं। साथ ही पूरी ‘गारंटी’ की बात दोहराई।

कानून से बचने के तरीके भी बताए

जांच में सामने आया कि विदेशी जमीन पर लिंग चयन कराया जाता है। भारत में यह अवैध है। दरअसल, PCPNDT Act 1994 के तहत गर्भ में लिंग जांच प्रतिबंधित है। इसके बावजूद विदेश में जेनेटिक टेस्टिंग के जरिए भ्रूण का चयन किया जाता है। फिर केवल XY क्रोमोसोम वाले भ्रूण को गर्भ में प्रत्यारोपित किया जाता है। डॉक्टरों ने यह भी कथित तौर पर सलाह दी कि भारत लौटकर प्रक्रिया का जिक्र न करें।

ऐसे होता है पूरा खेल

यह पूरा मामला IVF और प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस (PGD) तकनीक से जुड़ा है। मूल उद्देश्य आनुवंशिक बीमारियों की रोकथाम है। लेकिन आरोप है कि इसका दुरुपयोग लिंग चयन में हो रहा है। पहले महिला को हार्मोन इंजेक्शन दिए जाते हैं। फिर अंडे निकाले जाते हैं। लैब में भ्रूण तैयार होता है। इसके बाद जेनेटिक टेस्टिंग होती है। अंत में चुने गए भ्रूण को गर्भ में डाला जाता है। लड़की वाले भ्रूण को नष्ट या फ्रीज करने का दावा किया गया। यही इस रैकेट का सबसे चिंताजनक पहलू है।

सामाजिक असर और कानूनी चुनौती

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह प्रवृत्ति लैंगिक असंतुलन को बढ़ा सकती है। साथ ही, महिलाओं के अधिकारों पर भी प्रश्न खड़े करती है। फिलहाल, यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित नेटवर्क और कानून की सीमाओं पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

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