थिंक टैंक ICRIER की रिपोर्ट में खुलासा, मिट्टी की सेहत बिगड़ी तो अनाज की ताकत भी घटी
पेट भर रहा, पर शरीर भूखा
भारत आज खाद्यान्न उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर है। दाल, चावल और रोटी हर थाली में मौजूद हैं। लोग भूखे नहीं सो रहे। इसके बावजूद कुपोषण खत्म नहीं हो रहा। यह सवाल अब सिर्फ आम लोगों का नहीं, बल्कि नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों की भी चिंता बन गया है। एक नई रिपोर्ट ने इस गहरी समस्या की असली वजह उजागर की है।
हरित क्रांति से पोषण संकट तक
एक समय था जब लाल बहादुर शास्त्री ने “जय जवान, जय किसान” का नारा दिया था। तब देश अनाज संकट से जूझ रहा था। आज स्थिति बदली है। भारत न केवल 140 करोड़ लोगों का पेट भर रहा है, बल्कि अनाज निर्यात भी कर रहा है। लेकिन इसी सफलता के साथ एक नया संकट पैदा हो गया है। पेट तो भर रहा है, लेकिन खाने में पोषण कम होता जा रहा है।
ICRIER रिपोर्ट का बड़ा खुलासा
भारत के प्रमुख आर्थिक थिंक टैंक ICRIER (Indian Council for Research on International Economic Relations) की रिपोर्ट बताती है कि देश में मिट्टी की गुणवत्ता तेजी से गिर रही है। मिट्टी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और जिंक जैसे जरूरी पोषक तत्वों की भारी कमी हो रही है। इसका सीधा असर फसलों की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। नतीजा यह है कि अनाज पेट तो भर रहा है, लेकिन शरीर को जरूरी पोषण नहीं दे पा रहा।
मिट्टी की सेहत क्यों बिगड़ी
ICRIER की रिसर्च फेलो रितिका जुनेजा के मुताबिक, इसका सबसे बड़ा कारण है उर्वरकों का बेतहाशा इस्तेमाल। ज्यादा उत्पादन के दबाव में किसान जरूरत से ज्यादा रासायनिक खाद डाल रहे हैं। इससे मिट्टी की जैविक और रासायनिक सेहत खराब हो रही है। अगर यही स्थिति बनी रही, तो भविष्य में यह संकट और गहरा सकता है।
खाद्य सुरक्षा मिली, पोषण सुरक्षा नहीं
ICRIER के प्रोफेसर डॉ. अशोक गुलाटी बताते हैं कि भारत ने 2024-25 में रिकॉर्ड 357.7 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन कर खाद्य सुरक्षा तो सुनिश्चित कर ली है। लेकिन पोषण सुरक्षा अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। समस्या भोजन की कमी नहीं, बल्कि भोजन की गुणवत्ता की है।
बच्चों पर पड़ रहा गहरा असर
गेहूं, चावल और दाल जैसे मुख्य खाद्य पदार्थों में भी अब पोषक तत्व कम हो रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS 2019–21) के अनुसार, पांच साल से कम उम्र के 35% बच्चे लंबाई में छोटे हैं और 32% कम वजन के हैं। यह सिर्फ कृषि नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी बड़ा संकट है।
समाधान क्या है?
थिंक टैंक ने 3P नीति – पॉलिसी, प्रोडक्ट और प्रैक्टिस पर जोर दिया है। उर्वरकों का संतुलित उपयोग, मिट्टी की नियमित जांच और किसानों को सही मार्गदर्शन देना जरूरी बताया गया है। जब मिट्टी स्वस्थ होगी, तभी अनाज भी ताकतवर बनेगा।

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