एक देश-एक टैक्स से आसान हुआ व्यापार, मगर नकदी प्रबंधन बना नई चुनौती
भारत में लागू किया गया वस्तु एवं सेवा कर (GST) अब तक का सबसे बड़ा टैक्स सुधार माना जाता है। GST से पहले देश में VAT, एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स, एंट्री टैक्स और चुंगी जैसे कई अप्रत्यक्ष कर लागू थे, जिससे टैक्स सिस्टम जटिल और कारोबार महंगा हो जाता था। GST का उद्देश्य था “एक देश, एक टैक्स” की व्यवस्था बनाकर व्यापार को आसान करना, टैक्स चोरी पर रोक लगाना और उपभोक्ताओं को सही कीमत पर उत्पाद उपलब्ध कराना।
GST लागू होने के बाद कई उत्पादों और सेवाओं की कीमतों में कमी आई, क्योंकि टैक्स की दोहरी मार खत्म हुई। लॉजिस्टिक्स लागत घटी, इंटर-स्टेट मूवमेंट आसान हुआ और कंपनियों को सप्लाई चेन ऑप्टिमाइजेशन का फायदा मिला। खासतौर पर FMCG, ऑटो और कंज्यूमर गुड्स सेक्टर में इसका सकारात्मक असर देखा गया।
हालांकि, GST ने जहां प्राइसिंग को पारदर्शी बनाया, वहीं वर्किंग कैपिटल मैनेजमेंट को एक नई चुनौती भी दी। GST में इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) सिस्टम के कारण कंपनियों को पहले टैक्स चुकाना पड़ता है और बाद में रिफंड या क्रेडिट मिलता है। इससे खासकर MSME और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की नकदी पर दबाव बढ़ा है।
इसके अलावा, समय पर रिटर्न फाइलिंग, ई-इनवॉइसिंग और कंप्लायंस की बढ़ती जरूरतों ने बिजनेस की फाइनेंशियल प्लानिंग को और सख्त बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि GST लंबी अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा, लेकिन इसके लिए कारोबारियों को बेहतर कैश-फ्लो प्लानिंग और डिजिटल सिस्टम अपनाने होंगे।
कुल मिलाकर GST ने भारतीय कारोबार की तस्वीर बदल दी है—कीमतें अधिक प्रतिस्पर्धी हुई हैं, लेकिन नकदी प्रबंधन अब पहले से ज्यादा रणनीतिक सोच की मांग करता है।
