डेरा सचखंड बल्लां में गुरु रविदास जयंती पर प्रधानमंत्री ने संत निरंजन दास से लिया आशीर्वाद
पंजाब की पावन धरती पर श्री गुरु रविदास महाराज जी की 649वीं जयंती का भव्य आयोजन पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। जालंधर स्थित डेरा सचखंड बल्लां में भक्तिमय वातावरण था। चारों ओर “जो बोले सो निर्भय” के जयघोष गूंज रहे थे। इसी बीच एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने हर किसी को भावुक कर दिया।
डेरा सचखंड बल्लां में ऐतिहासिक पल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे ही डेरा सचखंड बल्लां पहुंचे, वहां मौजूद श्रद्धालुओं में उत्साह देखने को मिला। मंच पर विराजमान रविदासिया समुदाय के सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु संत निरंजन दास जी के सामने प्रधानमंत्री ने प्रोटोकॉल से हटकर अत्यंत विनम्रता दिखाई। उन्होंने संत के चरण स्पर्श किए और आशीर्वाद लिया। यह दृश्य देखते ही देखते देशभर की सुर्खियों में छा गया।
पहले प्रधानमंत्री बने पीएम मोदी
यह दौरा कई मायनों में ऐतिहासिक माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डेरा सचखंड बल्लां पहुंचने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री बन गए हैं। इससे पहले किसी भी प्रधानमंत्री ने इस पवित्र स्थल पर जाकर संत समाज के शीर्ष गुरु से प्रत्यक्ष आशीर्वाद नहीं लिया था। यह कदम सामाजिक समरसता की दिशा में एक बड़ा संदेश देता है।
संत निरंजन दास को मिला पद्म श्री सम्मान
गौरतलब है कि संत निरंजन दास जी को हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा ‘पद्म श्री’ सम्मान से नवाजा गया है। उन्हें यह सम्मान समाज सेवा, आध्यात्मिक चेतना और गुरु रविदास महाराज की शिक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए दिया गया। प्रधानमंत्री का यह सम्मानजनक व्यवहार उसी कड़ी का विस्तार माना जा रहा है।
गुरु रविदास के बेगमपुरा का संदेश
प्रधानमंत्री मोदी का यह कदम गुरु रविदास महाराज के ‘बेगमपुरा’ के संकल्प को दर्शाता है। यह वह अवधारणा है, जिसमें ऐसा समाज हो जहां कोई दुख, भेदभाव या अन्याय न हो। पीएम का संत के चरणों में नतमस्तक होना सामाजिक समानता और सम्मान की भावना को मजबूती देता है।
डेरा सचखंड बल्लां की सामाजिक भूमिका
संत निरंजन दास जी के नेतृत्व में डेरा सचखंड बल्लां दलित और वंचित समाज के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक उत्थान के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहा है। यह संस्थान केवल धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का मजबूत स्तंभ बन चुका है। प्रधानमंत्री द्वारा सार्वजनिक मंच पर संत को दिया गया सम्मान केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि सदियों पुरानी उस आध्यात्मिक विरासत के प्रति कृतज्ञता है, जो मानवता को समानता और भाईचारे का संदेश देती आई है।
