दूसरे कार्यकाल में ‘अमेरिका फर्स्ट’ की वापसी, पुराने सहयोगी हैरान और दुनिया के समीकरण उलट-पुलट
दूसरी बार सत्ता में आते ही बदला रुख
डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद वैश्विक राजनीति में हलचल तेज हो गई है। पहले जहां अमेरिकी विदेश नीति गठबंधनों और साझेदारी पर आधारित थी, वहीं अब ‘अमेरिका फर्स्ट’ फिर से निर्णायक नीति बन गई है। नतीजतन, पुराने दोस्त असहज हैं और अमेरिका के पारंपरिक विरोधी नए अवसर तलाश रहे हैं। ट्रंप की कूटनीति अब भावनाओं से नहीं, सीधे लाभ और दबाव की रणनीति पर चल रही है।
भारत-अमेरिका रिश्तों में आई तल्खी
भारत और अमेरिका के संबंध पहले जैसे सहज नहीं रहे। हालांकि पीएम मोदी और ट्रंप के बीच संवाद बना रहा, लेकिन व्यापार और टैरिफ को लेकर मतभेद बढ़े। जीएसपी से भारत को बाहर करना इसका बड़ा संकेत रहा। वहीं भारत ने रूस के साथ संबंध और यूरोपीय यूनियन से व्यापार समझौते कर यह स्पष्ट किया कि वह किसी एक शक्ति पर निर्भर नहीं रहेगा।
कनाडा और मैक्सिको भी नहीं बचे
ट्रंप ने कनाडा और मैक्सिको पर भारी टैरिफ लगाकर व्यापारिक रिश्तों में तनाव पैदा किया। इसके जवाब में दोनों देशों ने भी कड़े कदम उठाए। इससे अमेरिका-मेक्सिको-कनाडा समझौता विवादों में आ गया और उत्तरी अमेरिका की आर्थिक स्थिरता पर सवाल खड़े हुए।
यूरोप से बढ़ी दूरी
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के बयान और नीतियां यूरोपीय संघ को नागवार गुजरीं। फ्रांस और ब्रिटेन के साथ रिश्तों में तल्खी बढ़ी। नाटो और ट्रांस-अटलांटिक सहयोग कमजोर पड़ा। इसके चलते यूरोप अब अपनी सुरक्षा और आर्थिक रणनीति पर ज्यादा फोकस कर रहा है।
एकतरफा नीति का असर
ट्रंप प्रशासन ने संयुक्त राष्ट्र के कई कार्यक्रमों, WHO और पेरिस जलवायु समझौते से दूरी बना ली। इससे अमेरिका की बहुपक्षीय भूमिका कमजोर हुई, लेकिन ट्रंप समर्थकों के लिए यह राष्ट्रहित की प्राथमिकता बनी।
पुराने विरोधी बने नए साझेदार
रूस, सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ ट्रंप के रिश्ते नए सिरे से परिभाषित हुए। सऊदी क्राउन प्रिंस एमबीएस के साथ तेल और रक्षा सौदों ने नजदीकी बढ़ाई। वहीं पाकिस्तान के साथ बढ़ते संपर्क ने अमेरिकी विदेश नीति में बड़ा बदलाव दिखाया।
