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‘यादों के दरीचे’ – 17वीं कड़ी:.

साठ के दशक में जब गंगापुर सिटी के निवासी रामलीला, रासलीला, नौटंकी आदि से मनोरंजन किया करते थे तो अग्रवाल समाज के सामाजिक नाटकों ने यहां के जन मानस में नई चेतना फूंकी थी। प्रतिवर्ष […]

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‘यादों के दरीचे’ – सोलहवीं कड़ी…

सर्व विदित है कि ताजमहल अपने अनूठे स्थापत्य से विश्व के सात आश्चर्यों में से एक है किन्तु इस आश्चर्य को अपने घर की चारपाई से लेटे हुए देखना भी तो एक आश्चर्य ही है। […]

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‘यादों के दरीचे’- पंद्रहवीं कड़ी…

अभी कुछ दिनों पहले गंगापुर सिटी का स्थापना दिवस उत्साहपूर्वक मनाया गया था। हम, प्रसंगवश अपने पाठकों को गंगापुर के अतीत की कुछ जानकारी दे रहे हैं। गंगापुर सिटी को इस समय खीर मोहन, टिक्कड़ […]

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‘यादों के दरीचे’- चौदहवीं कड़ी

किशोरावस्था तक बच्चों की परवरिश में बड़ी सावधानी की आवश्यकता होती है। उनकी हरेक गतिविधियों को माता-पिता द्वारा नजऱ अंदाज कर दिया जाना प्राय: हितकर नहीं होता। कुख्यात डाकू मानसिंह ने बचपन में एक पेंसिल […]

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‘यादों के दरीचे’ – तेरहवीं किश्त

अगर, डाकू किसी का अपहरण करें तो अमूमन किसी खौफनाक अंजाम की कल्पना ही की जाती है, किन्तु कुछ मामले बिरले भी हुए हैं। कहते हैं, एक दफा हिन्दी के विख्यात कवि गोपालदास नीरज को […]

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‘यादों के दरीचे’- 12वीं कड़ी

हायर सैकेंडरी स्कूल में अखिल भारतीय स्तर के उस कवि सम्मलेन के अलावा जो स्मरणीय आयोजन हुए थे उनमें वर्ष 1975-76 का राजस्थान केसरी दंगल भी एक था। उस दंगल में हिन्द केसरी महाबली सतपाल, […]

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‘यादों के दरीचे’ – ग्यारहवीं किश्त

नवान्न के पकते ही अर्थात् होली के पश्चात् भारत में पर्वों और मेलों का सिलसिला शुरू हो जाता है। हमारे शहर गंगापुर सिटी में शीतला माता, गणगौर उत्सव तथा कल्याणजी के मेले क्रमश: आयोजित होते […]

धर्म/ज्योतिष

‘यादों के दरीचे’ – दसवीं किश्त

गंगापुर सिटी का पहला अखिल भारतीय स्तर का कवि सम्मेलन संभवत: सन् 1969 में हायर सैकेंडरी स्कूल में आयोजित हुआ था। उस समय के प्रधानाचार्य राधाकृष्ण शर्मा एवं वरिष्ठ अध्यापक हरिप्रसाद शास्त्री के संयुक्त प्रयासों […]

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‘यादों के दरीचे’- नवीं कड़ी

सन् 1899 में अर्थात् स्वाधीनता से पूर्व गंगापुर सिटी में पहले प्राइमरी स्कूल की स्थापना हुई थी और इसी स्कूल को 1922 में मिडिल तथा 1945 में सैकेंडरी स्कूल बनाया गया। इसके ग्यारह वर्ष बाद […]

बिजनेस

‘यादों के दरीचे’ – आठवीं कड़ी

साठ के दशक में हिन्दी के पाठकों की रूचि में गजब का परिवर्तन आया। उनका रूझान एकाएक पाकेट बुक्स की ओर बढ़ा। एएच व्हीलर्स और बस स्टैंड की दुकानों पर सामाजिक और जासूसी उपन्यास नजऱ […]