अब अल्लाह ही मालिक! कागजों पर तरक्की, हकीकत में बदहाली—रिपोर्ट ने खोली पाकिस्तान की पोल

Pakistan economic crisis showing rising inflation and declining purchasing power
महंगाई और नाकाम नीतियों से जूझती पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था

महंगाई, कमजोर विकास दर और नाकाम चीनी मॉडल ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को आम जनता के लिए बोझ बना दिया है।

पड़ोसी देश पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था एक बार फिर गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। ताज़ा आर्थिक रिपोर्ट्स ने यह साफ कर दिया है कि कागजों पर दिखाई जा रही तरक्की जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता के दावों के बीच आम पाकिस्तानी की जेब पूरी तरह खाली होती जा रही है और क्रय शक्ति लगभग दम तोड़ चुकी है।

एक्सप्रेस ट्रिब्यून द्वारा प्रकाशित हाउसहोल्ड इंटीग्रेटेड इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार, पाकिस्तान की औसत जीडीपी वृद्धि दर हाल के वर्षों में केवल 2.47 प्रतिशत रही है, जबकि जनसंख्या वृद्धि दर 2.55 प्रतिशत के करीब है। इसका सीधा अर्थ है कि देश में जितनी तेजी से आबादी बढ़ रही है, उतनी आर्थिक तरक्की नहीं हो पा रही। परिणामस्वरूप आम लोगों के हिस्से में बदहाली ही आ रही है।

पिछले 50 वर्षों की सबसे ऊंची महंगाई ने हालात और भयावह बना दिए हैं। शहरी इलाकों में अमीर और गरीब के बीच की खाई तेजी से बढ़ी है। जहां शीर्ष आय वर्ग की आमदनी में 119 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई, वहीं निचले वर्ग की आय में अपेक्षाकृत कम इजाफा दर्ज किया गया। इससे सामाजिक असमानता और गहराई है।

बीते एक दशक से पाकिस्तान ने अपनी आर्थिक समस्याओं का समाधान चीन में खोजा और चीनी निवेश को ‘गेम चेंजर’ बताया, लेकिन यह मांग-आधारित मॉडल अपेक्षित परिणाम देने में असफल रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कर सुधार, व्यापार में आसानी और सरकारी खर्चों में कटौती नहीं की जाती, हालात नहीं बदलेंगे।

रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि अगर पाकिस्तान ने आपूर्ति-आधारित नीतियां और शिक्षा-कौशल सुधार नहीं अपनाए, तो यह तथाकथित स्थिरता देश को समृद्धि नहीं, बल्कि आर्थिक जड़ता की ओर ही ले जाएगी।

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