विश्व युद्धों से लेकर कारगिल और सियाचिन तक, भारतीय सेना का युद्ध अनुभव इसे वैश्विक स्तर पर अलग पहचान देता है।
हर साल 15 जनवरी को भारत नेशनल आर्मी डे मनाता है। यह दिन भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है। 15 जनवरी 1949 को फील्ड मार्शल के.एम. करिअप्पा ने ब्रिटिश जनरल सर फ्रांसिस बुचर से भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ का पद संभाला था। तभी से यह दिन सेना के सम्मान में मनाया जाता है।
भारतीय सेना को दुनिया की सबसे अनुभवी सेनाओं में गिना जाता है, जिसकी नींव आज़ादी से पहले ही पड़ चुकी थी। प्रथम विश्व युद्ध में करीब 13 लाख और द्वितीय विश्व युद्ध में 25 लाख से अधिक भारतीय सैनिकों ने भाग लिया। एशिया, यूरोप, अफ्रीका और मध्य-पूर्व में लड़े गए इन युद्धों ने भारतीय सैनिकों को आधुनिक हथियारों और बहुराष्ट्रीय सेनाओं के साथ युद्ध का गहरा अनुभव दिया।
1947 के बाद भारतीय सेना ने कई बड़े युद्ध लड़े। 1947-48 का भारत-पाक युद्ध, 1962 का भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध, और 1999 का कारगिल युद्ध भारतीय सेना की रणनीतिक और पर्वतीय युद्ध क्षमता का प्रमाण हैं। खासतौर पर 1971 के युद्ध के बाद बांग्लादेश का निर्माण हुआ, जो भारत की निर्णायक सैन्य जीत मानी जाती है।
इसके अलावा सेना ने ऑपरेशन पोलो, ऑपरेशन विजय (गोवा) और ऑपरेशन मेघदूत जैसे अहम सैन्य अभियानों को अंजाम दिया। सियाचिन ग्लेशियर जैसे दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र में तैनाती ने भारतीय सेना की सहनशक्ति और कौशल को वैश्विक स्तर पर साबित किया है।

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